मध्यप्रदेश

जेल में नहीं गूंजेगी किलकारी? गर्भवती महिला कैदियों को 15 दिन की पैरोल, फिर भी नहीं मिल रहा लाभ

भोपाल
 जेल में बंद गर्भवती महिलाओं के बच्चों को जन्मस्थान के तौर पर जेल की पहचान न मिले, इसके लिए उन्हें प्रसव से पहले 15 दिन की पैरोल लेने की सुविधा दी गई है। हालांकि, जानकारी के अभाव में कई महिला कैदी इस विकल्प का लाभ नहीं उठा पा रही हैं। जेल प्रशासन का प्रयास है कि किसी भी गर्भवती महिला को जेल परिसर में प्रसव की स्थिति का सामना न करना पड़े।

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प्रदेश की जेलों में इस समय 10 गर्भवती महिला कैदी हैं। इनमें दो महिलाएं सजा प्राप्त हैं, जबकि आठ विचाराधीन कैदी हैं। जेल मुख्यालय की ओर से इन सभी की स्वास्थ्य निगरानी की जा रही है। 

सरकारी अस्पताल में ही कराया जा रहा प्रसव
जेल महानिदेशक वरुण कपूर के अनुसार, बड़ी जेलों में अस्पताल की सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद गर्भवती महिला कैदियों का प्रसव जेल में नहीं कराया जाता। उन्हें प्रसव के लिए मेडिकल कॉलेज से संबद्ध अस्पताल या नजदीकी जिला अस्पताल भेजा जाता है। इससे मां और नवजात दोनों को बेहतर चिकित्सकीय सुविधा मिल सके।

अब जेल प्रशासन हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वाली महिला कैदियों की पहचान और निगरानी को और मजबूत करने की तैयारी में है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रसव के दौरान अचानक आपात स्थिति पैदा होने पर भी महिला को जेल में ही प्रसव कराने की नौबत न आए।

जन्म में जेल का उल्लेख नहीं
महिला कैदियों से जन्मे बच्चों के भविष्य पर जेल की पहचान की छाप न पड़े, इसके लिए शासन ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि उनके जन्म प्रमाण पत्र में जेल का उल्लेख नहीं किया जाएगा। जन्मस्थान के तौर पर संबंधित क्षेत्र या जिस शासकीय अस्पताल में प्रसव हुआ है, उसका नाम दर्ज किया जाएगा।

इसी उद्देश्य से महिला कैदियों को प्रसव के आसपास 15 दिन की पैरोल लेने का विकल्प भी उपलब्ध है। लेकिन पर्याप्त जानकारी न होने के कारण इसका उपयोग सीमित है।

हाल ही में महाराष्ट्र के नासिक की एक अदालत ने भी एक महिला को प्रसव के लिए जमानत देने के निर्देश देते हुए टिप्पणी की थी कि जेल में बच्चे को जन्म देना किसी महिला के लिए गहरे सदमे से कम नहीं है। ऐसे मामलों ने जेलों में गर्भवती महिला कैदियों के लिए संवेदनशील और मानवीय व्यवस्था की जरूरत को फिर सामने ला दिया है।

 

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