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आखिरी दिन भी सुनाए 11 फैसले, एक दिन पहले हुई मां की मौत, SC जज अभय ओका ने तोड़ी परंपरा

नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायरमेंट के दिन आमतौर पर कोई फैसला नहीं सुनाते, लेकिन जस्टिस एएस ओका ने इस पुरानी रवायत को बदल दिया है। उन्होंने शुक्रवार को अपने आखिरी कार्यदिवस पर कई बेंचों में हिस्सा लिया और 11 फैसले दिए। ऐसा उन्होंने तब किया है, जब उनकी मां का एक दिन पहले ही निधन हुआ था। वह गुरुवार को ही अपनी मां के अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने के लिए मुंबई गए थे और फिर लास्ट वर्किंग डे पर काम करने के लिए दिल्ली लौट आए। शुक्रवार को शीर्ष अदालत में उनका आखिरी दिन था और इस मौके पर भी वह सिर्फ विदाई समारोह के आयोजनों में ही नहीं रहे बल्कि 11 फैसले सुनाए। उनका शनिवार को लास्ट डे रहेगा, लेकिन आज आखिरी कार्यदिवस था।

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उन्होंने पहले ही कहा था कि वह रिटायरमेंट शब्द से नफरत करते हैं। इसके अलावा उनका कहना था कि जजों को आखिरी दिन भी फैसले सुनाने चाहिए और बेंच का हिस्सा बनना सही रहता है। इसी के तहत उन्होंने कई सुनवाई में हिस्सा लिया और फिर अंत में प्रतीकात्मक बेंच का भी हिस्सा बने, जिसका नेतृत्व चीफ जस्टिस बीआर गवई कर रहे थे। किसी भी जज के रिटायरमेंट पर प्रतीकात्मक जज चीफ जस्टिस के नेतृत्व में बैठती है। ऐसा जस्टिस को सम्मानजनक विदाई के लिए किया जाता है और यह परंपरा शीर्ष अदालत में दशकों से चली आ रही है।

जस्टिस ओका बोले- आखिरी दिन भी करना चाहिए पूरा काम
बता दें कि 21 मई को जस्टिस ओका के लिए फेयरवेल समारोह आयोजित हुआ था। इसका आयोजन सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन की ओर से किया गया था। इस दौरान कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि मैं इस परंपरा को सही नहीं मानता कि रिटायरमेंट के दिन जज काम ही न करें। मैं पसंद करूंगा कि आखिरी कार्यदिवस पर भी काम करूं और कुछ फैसलों का हिस्सा बनूं। इसके अलावा उनका कहना था कि रिटायर होने वाले जज के लिए गार्ड ऑफ ऑनर 1:30 बजे दिया जाता है, जिसमें थोड़ी देरी की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि आखिरी दिवस पर कम से कम शाम को 4 बजे तक तो काम करना ही चाहिए।

जिला अदालत से की थी शुरुआत और SC तक आ पहुंचे
उन्होंने कहा था कि मैं तो रिटायरमेंट शब्द से ही नफरत करता हूं। बता दें कि जस्टिस ओका ने यूनिवर्सिटी ऑफ बॉम्बे से लॉ की पढ़ाई करने के बाद जून 1983 से वकालत शुरू की थी। उन्होंने अपने पिता श्रीनिवास ओका के ठाणे जिला अदालत स्थित चेंबर से वकालत शुरू की थी और वहां से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज तक का सफर तय किया। उनकी 29 अगस्त, 2003 को बॉम्बे हाई कोर्ट में एंट्री हुई थी। तब वह अस्थायी जज थे और फिर 2005 में परमानेंट हुए। वह कर्नाटक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस 10 मई, 2019 को बने थे। फिर वह 31 अगस्त, 2021 को सुप्रीम कोर्ट में जज के तौर पर आए। उनका कार्य़काल शीर्ष अदालत में करीब 4 साल का रहा है।

 

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