मध्यप्रदेश

महाकाल मंदिर में 13,000 स्क्वेयर फीट में बन रहा हीट प्रूफ पाथ-वे, श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए

 उज्जैन
 ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर में गर्मी को देखते हुए श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए हीट प्रूफ पाथवे का निर्माण कराया गया है। इस पर चलने से श्रद्धालुओं के पैर नहीं जलेंगे।प्रशासक प्रथम कौशिक ने बताया मंदिर समिति अध्यक्ष कलेक्टर रौशन कुमार सिंह के निर्देश पर ग्रीष्म ऋतु में भक्तों की सुविधा के लिए विशेष व्यवस्थाएं की जा रही हैं। इसी क्रम में मंदिर परिसर एवं श्री महाकाल महालोक में दर्शन पथ पर (लगभग 13 हजार स्क्वेयर फीट में ) हीट प्रूफ पाथ-वे (सोलर रिफ्लेक्टिव पेंट) का निर्माण कार्य किया जा रहा है।

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यह हीट प्रूफ पाथ-वे नीलकंठ से पंचमुखी हनुमान, मानसरोवर से होते हुए शंख द्वार एवं बड़ा गणेश मंदिर तक बनाया जा रहा है। इस हीट प्रूफ पाथ-वे के निर्माण से तपती धूप में भी श्रद्धालुओं के पैर नहीं जलेंगे तथा वे बिना किसी असुविधा के सहजता से दर्शन पथ पर आवागमन कर सकेंगे। दर्शन हेतु प्रवेश एवं निर्गम मार्ग पर यह व्यवस्था विशेष रूप से लाभकारी सिद्ध होगी, जिससे श्रद्धालु गर्मी के बावजूद सुरक्षित एवं आरामदायक तरीके से भगवान श्री महाकालेश्वर जी के दर्शन कर सकेंगे।

श्रद्धालुओं के लिए मंदिर समिति ने लिया फैसला
बाबा महाकाल के दर्शन करने रोजाना 1 लाख से ज्यादा श्रदालु आते हैं. इन्हीं के साथ वीवीआईपी, राजनेता, अभिनेता, व क्रिकेटर भी बाबा महाकाल के दरबार में माथा टेकने पहुंचते हैं. उज्जैन व आसपास क्षेत्र में गर्मी भी अपना तेवर दिखा रही है. जिससे महाकाल मंदिर में आने वाले श्रदालुओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. ऐसा में श्रद्धालुओं की सुविधान का ध्यान में रखते हुए महाकाल प्रबंधन समिति ने कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। 

महाकाल मंदिर में बनाया जा रहा हीट प्रूफ पाथ-वे
जिसमें महाकाल लोक में शेड लगाने व हीट प्रूफ पाथ-वे बनाया जा रहा है. प्रंबधन समिति ने ठंडे पानी, मेटिंग व कूलर की व्यवस्था तो पहल ही कर रखी है. साथ ही गर्मी से बचने के लिए स्प्रिंगर भी लगाए गए हैं. सहायक प्रशासक आशीष फलवाड़िया ने बताया कि "श्री महाकालेश्वर मंदिर में भगवान महाकाल के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए कलेक्टर व अध्यक्ष रोशन कुमार सिंह, प्रशासक व अपर कलेक्टर प्रथम कौशिक द्वारा दिए गए निर्देश पर विशेष व्यवस्थाएं की जा रही हैं। 

कहां से कहां तक बन रहा पाथ वे
इसी क्रम में मंदिर परिसर व महाकाल महालोक में दर्शन पथ पर लगभग 13 हजार स्क्वायर फीट में हीट प्रूफ पाथ-वे सोलर रिफ्लेक्टिव पेंट का निर्माण कार्य किया जा रहा है. यह हीट प्रूफ पाथ-वे नीलकंठ से पंचमुखी हनुमान, मानसरोवर से होते हुए शंख द्वार एवं बड़ा गणेश मंदिर तक किया जा रहा है. इस हीट प्रूफ पाथ-वे के निर्माण से तपती धूप में भी श्रद्धालुओं के पैर नहीं जलेंगे. वे बिना किसी असुविधा के सहजता से दर्शन पथ पर आवागमन कर सकेंगे। 

जलकुंभी निकालने व उसके निपटान के लिए उठाया कदम
 श्री महाकालेश्वर मंदिर के पीछे स्थित पौराणिक और धार्मिक महत्व के रुद्र सागर को स्वच्छ रखने के लिए उज्जैन नगर निगम ने एक बार फिर कवायद शुरू की है। निगम के स्वास्थ्य विभाग द्वारा रुद्र सागर (बड़ा एवं छोटा) से जलकुंभी निकालने और उसके निपटान के लिए वार्षिक सफाई का टेंडर जारी किया गया है। अनुमानित लागत 14 लाख 55 हजार रुपये तय की है।

कहा है कि यह अनुबंध एक वर्ष के लिए होगा। रुद्र सागर उज्जैन के उन पौराणिक सप्त सागरों में शामिल है, जिनका शास्त्रों में विशेष उल्लेख है। इसके केंद्र में सम्राट विक्रमादित्य की अपने नौ रत्नों के साथ विशाल प्रतिमा स्थापित है, जो उज्जैन के गौरवशाली इतिहास का प्रतीक है। सागर की दीवारों पर सम्राट विक्रमादित्य काल के प्रतीक चिन्ह और 32 पुतलियां इसकी सुंदरता में चार चांद लगाती हैं।

प्रशासन का यह नैतिक और प्रशासनिक दायित्व है कि महाकाल मंदिर के इतने करीब स्थित इस जल निकाय को सदैव स्वच्छ रखा जाए। विशेष रूप से 2022 में महाकाल महालोक के निर्माण के बाद यहां पर्यटकों और श्रद्धालुओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। नगर निगम द्वारा अब वार्षिक सफाई का टेंडर जारी करना इस बात का संकेत है कि प्रशासन इस समस्या का स्थाई समाधान ढूंढने की कोशिश कर रहा है।

हालांकि, स्थानीय नागरिकों और पर्यावरणविदों का मानना है कि केवल टेंडर जारी करने से काम नहीं चलेगा; सफाई की निरंतरता और गुणवत्ता की निगरानी करना भी उतना ही आवश्यक है ताकि करोड़ों की लागत से संवारा गया यह पौराणिक सागर अपनी पहचान न खोए।

करोड़ों का बजट, फिर भी उपेक्षा का शिकारहैरानी की बात यह है कि बीते डेढ़ दशकों में रुद्र सागर के सुंदरीकरण और सफाई पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। 2022 से पहले यह क्षेत्र घोर उपेक्षा का शिकार था।

महालोक के निर्माण के बाद स्थिति में सुधार की उम्मीद थी, लेकिन अनुभव यह रहा है कि रुद्र सागर साल में केवल दो से चार महीने ही साफ रह पाता है। शेष समय यह जलकुंभी की मोटी चादर से ढंका रहता है, जो न केवल जलीय पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि आने वाले श्रद्धालुओं के अनुभव को भी खराब करती है।

 

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