मध्यप्रदेश

काठमांडू में गूंजेगी भोपाल के बाघों की कहानी, 42 देशों के वैज्ञानिक करेंगे अध्ययन

भोपाल
 मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में शहरीकरण के बीच बाघों के जिंदा रहने और इंसानों के साथ उनके अनोखे तालमेल पर हुई एक बेहद अहम स्टडी को नेपाल की राजधानी काठमांडू में पेश किया गया है। काठमांडू में 3 से 5 जून 2026 तक चल रहे छठे कंजर्वेशन एशिया कांग्रेस में इस रिसर्च को दुनिया भर के वैज्ञानिकों के सामने रखा गया।

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now

इस ग्लोबल इवेंट को 'सोसाइटी फॉर कंजर्वेशन बायोलॉजी एशिया रीजन', नेपाल चैप्टर और बुरहान फाउंडेशन मिलकर आयोजित कर रहे हैं, जिसमें 42 देशों के 600 से ज्यादा एक्सपर्ट्स शामिल हुए हैं। खास बात यह है कि इस संस्था के एशिया चैप्टर के प्रेसिडेंट डॉ. कौस्तुभ शर्मा खुद भोपाल के रहने वाले हैं।

कैमरा ट्रैप और जीआईएस मैपिंग से खुला राज
वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और मध्य प्रदेश वन विभाग के सहयोग से हुई इस रिसर्च में बायो-सोशल तरीका अपनाया गया। इसमें फील्ड सर्वे, कैमरा ट्रैप, जीआईएस मैपिंग और स्थानीय लोगों के इंटरव्यू शामिल किए गए। स्टडी में यह जानने की कोशिश की गई कि भोपाल के जंगल, तालाब और हरियाली वाले इलाके कैसे बाघों की आवाजाही में मददगार साबित हो रहे हैं।

रिसर्च में सामने आया कि भोपाल में प्राकृतिक जमीन का सही इस्तेमाल, आपस में जुड़े नदी-तालाब और हरियाली (ब्लू-ग्रीन स्पेस), जंगलों में पर्याप्त शिकार, स्थानीय लोगों की स्वीकार्यता और बाघों के बदलते बर्ताव की वजह से ही वे इस शहरी माहौल में भी खुद को बचाए हुए हैं।

बढ़ते हाईवे और इंफ्रास्ट्रक्चर से बड़ा खतरा
जहाँ एक तरफ भोपाल में बाघों का बचना बड़ी कामयाबी है, वहीं रिसर्चर्स ने एक गंभीर चेतावनी भी दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, शहर में तेजी से फैल रही सड़कों और लीनियर इंफ्रास्ट्रक्चर, जैसे रेलवे लाइन या बिजली के तार की वजह से बाघों के आने-जाने के रास्ते बदल रहे हैं और उनके जंगल छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट रहे हैं।

Related Articles

Back to top button