मध्यप्रदेश

सिंहस्थ 2028 से पहले उज्जैन में नमामि गंगे मिशन की बड़ी चुनौती, विकास कार्यों के बीच समय पर पूरा करना लक्ष्य

उज्जैन
तीन साल की लंबी प्रतीक्षा और कड़े संघर्ष के बाद आखिरकार शिप्रा नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने वाले ''नमामी गंगे मिशन'' को केंद्र सरकार से हरी झंडी तो मिल गई है, लेकिन अब प्रशासन और निर्माण एजेंसी के सामने इससे भी बड़ी अग्निपरीक्षा शुरू होने जा रही है। गाजियाबाद (उत्तरप्रदेश) की ‘सोमवंशी एनवायरो फर्म’ को 81 करोड़ रुपये का टेंडर मंजूर होने के बाद, अब सबसे बड़ा संकट सिंहस्थ-2028 की समय-सीमा के भीतर इस पूरी परियोजना को धरातल पर उतारने का है।

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now

टेंडर की शर्तों के मुताबिक, इस पूरी परियोजना को पूरा करने के लिए 18 महीने का समय निर्धारित है। लेकिन तकनीकी और वित्तीय उलझनों के कारण जो परियोजना दो साल पहले शुरू हो जानी थी, उसमें तीन साल की भारी देरी हो चुकी है। इस लेती-लतीफी के कारण अब प्रशासन के पास समय बहुत कम बचा है।

वर्तमान में उज्जैन शहर के भीतर सिंहस्थ महाकुंभ की तैयारियों को लेकर सड़क चौड़ीकरण, नए घाटों का निर्माण, पुल, सीवरेज नेटवर्क और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े दर्जनों विकास कार्य एक साथ समानांतर रूप से चल रहे हैं। ऐसे में अलग-अलग निर्माण एजेंसियों के बीच आपसी समन्वय बैठाना और बिना किसी बाधा के समयबद्ध तरीके से काम को अंजाम देना जिला प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होगा। यदि इस बार भी काम समय पर पूरा नहीं हुआ, तो सिंहस्थ से पहले शिप्रा शुद्धिकरण का मुख्य लक्ष्य सीधे तौर पर प्रभावित हो सकता है।

एमआईसी कब करेगी मंजूर
केंद्र सरकार ने तो ठेकेदार तय करने को स्वीकृति दे दी मगर एमआइसी यानी महापौर परिषद से स्वीकृति मिलना अभी बाकी है। ये स्वीकृति कब मिलेगी, स्वीकृति उपरांत कार्य आदेश कब जारी होगा, कब भूमि पूजन होगा, ये अभी तय नहीं हो सका है।
92.78 करोड़ की थी प्रशासनिक स्वीकृति, 81 करोड़ में हुआ टेंडर लॉक

शिप्रा नदी में मिलने वाले भैरवगढ़ और पीलियाखाल क्षेत्र के दूषित पानी को रोकने के लिए केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने 24 मई 2023 को ही 92 करोड़ 78 लाख रुपये की प्रशासनिक मंजूरी दे दी थी। जून 2023 में महापौर परिषद (एमआइसी) से हरी झंडी मिलने के बाद चार फर्मों ने निविदा में भाग लिया, लेकिन कड़ी परीक्षण प्रक्रिया के चलते पूर्व के सभी प्रस्ताव निरस्त करने पड़े। इसके बाद इसी साल फरवरी में संशोधित दरों के साथ फिर से टेंडर बुलाए गए, जिसमें अब गाजियाबाद की कंपनी का चयन किया गया है।

पीएलसी-स्काडा आधारित मानिटरिंग और 15 साल का मेंटेनेंस
इस हाईटेक परियोजना के तहत पीलियाखाल क्षेत्र में 22.06 एमएलडी क्षमता का सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट और भैरवगढ़ क्षेत्र में 2.38 एमएलडी क्षमता का एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित होगा। बता दे कि अभी भैरवगढ़ क्षेत्र में बाटिक प्रिंट इकाइयों का केमिकल युक्त पानी सीधे शिप्रा में मिलता है, प्लांट लगने के बाद नहीं मिलेगा। योजना अनुसार दो सीवेज पंपिंग स्टेशन, दो एफ्लुएंट पंपिंग स्टेशन, 1420 मीटर राइजिंग मेन और 3500 मीटर एफ्लुएंट पाइपलाइन बिछाई जाएगी। जल की शुद्धता की रियल-टाइम जांच के लिए अत्याधुनिक पीएलसी-स्काडा आधारित मानिटरिंग सिस्टम लगेगा। पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए यह प्लांट सौर ऊर्जा आधारित सुविधाओं से लैस होगा। खास बात यह है कि निर्माण पूरा होने के बाद संबंधित एजेंसी ही अगले 15 वर्षों तक इसके संचालन और रख-रखाव का पूरा जिम्मा संभालेगी।

सिंहस्थ-2028 के लिहाज से क्या बदलेगा

नालों पर रोक: भैरवगढ़ की रंगाई-छपाई फैक्ट्रियों और पीलियाखाल का गंदा पानी अब सीधे शिप्रा नदी में नहीं मिलेगा।

शुद्ध जल: सीवेज का पूर्ण उपचार होने से नदी की जल गुणवत्ता में अभूतपूर्व सुधार होगा।

आस्था का सम्मान: सिंहस्थ महाकुंभ में आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं को आचमन और स्नान के लिए स्वच्छ व अविरल शिप्रा जल मिल सकेगा।

Related Articles

Back to top button