मध्यप्रदेश

सहमति से तलाक के लिए 6 महीने का इंतजार जरूरी नहीं, इंदौर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश पलटा

इंदौर 

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पति-पत्नी आपसी सहमति से तलाक लेना चाहते हैं तो हर मामले में 6 महीने की प्रतीक्षा अवधि पूरी करना अनिवार्य नहीं है। यदि दोनों लंबे समय से अलग रह रहे हैं, साथ रहने की कोई संभावना नहीं है और सुलह की कोशिशें भी विफल हो चुकी हैं, तो परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय प्रतीक्षा अवधि माफ कर सकता है।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें तलाक की प्रक्रिया में 6 महीने की अवधि पूरी होने तक इंतजार करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने यह आदेश 6 अक्टूबर को जारी किया है।

फैमिली कोर्ट ने अप्रैल 2027 की तारीख तय की थी

15 दिन के भीतर आवेदन पर निर्णय लें
जस्टिस संदीप एन. भट्ट ने अशुतोष की याचिका स्वीकार करते हुए इंदौर के फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि 6 महीने की प्रतीक्षा अवधि माफ करने के आवेदन पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के हालिया निर्णयों को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से फैसला किया जाए।

कोर्ट ने कहा है कि प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के 15 दिन के भीतर इस आवेदन पर निर्णय लिया जाए।
पति-पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए संयुक्त आवेदन दिया था। दोनों अप्रैल-मई 2025 से अलग रह रहे हैं। इसके बावजूद फैमिली कोर्ट ने छह महीने की प्रतीक्षा अवधि का हवाला देते हुए अगली सुनवाई की तारीख 4 अप्रैल 2027 तय कर दी थी।

पति ने मांगी थी प्रतीक्षा अवधि में छूट
पति की ओर से छह महीने की अवधि माफ करने के लिए आवेदन दिया गया था। फैमिली कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। इसके बाद पति ने हाई कोर्ट का रुख किया।

हाई कोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए कहा कि धारा 13-बी(2) में निर्धारित छह महीने की अवधि का उद्देश्य पति-पत्नी को जल्दबाजी में तलाक लेने से रोकना और विवाह बचाने की संभावना तलाशने का अवसर देना है।

सुलह की संभावना नहीं तो विवाह को लंबा खींचना उचित नहीं

कोर्ट ने कहा कि जब पति-पत्नी लंबे समय से अलग रह रहे हों, उनके बीच सुलह की कोई संभावना न बची हो और समझौते की कोशिशें भी विफल हो चुकी हों, तब केवल प्रतीक्षा अवधि पूरी कराने के लिए वैवाहिक विवाद को लंबा खींचना कानून के उद्देश्य के अनुरूप नहीं होगा।

ऐसी परिस्थितियों में कोर्ट मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए छह महीने की अवधि माफ करने पर विचार कर सकता है।

अब फैमिली कोर्ट को नए सिरे से करना होगा फैसला
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के पूर्व आदेश को निरस्त करते हुए मामले को वापस भेज दिया है। अब फैमिली कोर्ट को सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के हालिया फैसलों के आधार पर पति के छह महीने की प्रतीक्षा अवधि माफ करने के आवेदन पर नए सिरे से निर्णय लेना होगा।

 

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