मध्यप्रदेश

‘डॉक्टर साहब को नौकरी छोड़ने से रोकना है’, MP में डॉक्टरों का पलायन रोकने का नया फॉर्मूला

भोपाल

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मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग ने राज्य के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी को पाटने के लिए एक अहम और सख्त कदम उठाया है। इस साल राज्यभर के जिला और ब्लॉक-स्तरीय स्वास्थ्य केंद्रों पर 3,118 बॉन्डेड डॉक्टरों की पोस्टिंग की गई है। विभाग का मुख्य संदेश बिल्कुल साफ है- 'डॉक्टरों को नौकरी छोड़ने नहीं देना है।' इसके लिए प्रशासन ने सभी जिला कलेक्टरों को मैदान में उतरकर इन युवा डॉक्टरों की शुरुआती समस्याओं को समझने और उन्हें पूरी सहायता प्रदान करने के निर्देश दिए हैं।

बॉन्ड नियमों के पालन में आया रिकॉर्ड उछाल
पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले इस बार अनिवार्य बॉन्ड प्रणाली का अनुपालन काफी बेहतर रहा है:

    इस साल कुल 3,118 डॉक्टरों की पोस्टिंग की गई।

    इनमें से 2,601 डॉक्टर (यानि 83% से अधिक) पिछले हफ्ते तक अपनी ड्यूटी ज्वाइन कर चुके हैं।

    तुलनात्मक रूप से देखें तो साल 2025 में यह आंकड़ा मात्र 39.5% और 2024 में 42% था।

    इतनी बड़ी संख्या में डॉक्टरों के जुड़ने से राज्य के अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी का आंकड़ा जो पहले करीब 5,000 था, अब घटकर लगभग 2,000 के आसपास रह जाने की उम्मीद है।

नई चुनौतियों से पार पाना बड़ी प्राथमिकता
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार, इस समय सबसे बड़ी चिंता इन डॉक्टरों के रिटेंशन (नौकरी में टिके रहना) को लेकर है। इनमें से अधिकांश युवा डॉक्टर पहली बार बड़े शहरों से बाहर दूरदराज और आदिवासी जिलों में काम करने पहुंचे हैं। वहां उन्हें आवास, भोजन, परिवहन और अन्य बुनियादी सुविधाओं के मोर्चे पर कई तरह की शुरुआती परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। विभाग का मानना है कि यदि शुरुआती महीनों में इन्हें एक सकारात्मक और अनुकूल माहौल मिल जाए, तो उनके नौकरी छोड़ने के मामलों में भारी कमी आएगी।

जनप्रतिनिधियों से भी सहयोग की अपील
इस दिशा में कलेक्टर्स को विशेष रूप से ब्रीफ किया गया है कि वे अपने-अपने जिलों में डॉक्टरों के रहने और काम करने की स्थितियों की समीक्षा के लिए ओरिएंटेशन सत्र आयोजित करें। इसके अलावा, विभाग ने स्थानीय विधायकों, सांसदों और अन्य जनप्रतिनिधियों से भी संपर्क साधा है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनके समर्थक या स्थानीय लोग डॉक्टरों पर अनावश्यक दबाव न बनाएं, बल्कि एक सकारात्मक और सहयोगी रुख अपनाएं।

क्या हैं मेडिकल बॉन्ड के कड़े नियम?

    मध्य प्रदेश में सरकारी मेडिकल कॉलेजों से पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए नियम स्पष्ट हैं:
    सामान्य वर्ग के एमबीबीएस स्नातक: ग्रामीण क्षेत्रों में 1 साल की अनिवार्य सेवा, ऐसा न करने पर 10 लाख रुपये का जुर्माना।

    एससी/एसटी वर्ग: नियम के तहत एक साल की सेवा और जुर्माना राशि 5 लाख रुपये।
    मेरिटोरियस/सीएम वेलफेयर योजना: सरकारी कॉलेजों से पढ़ने वाले इन छात्रों को 2 साल की सेवा देनी होगी और 10 लाख रुपये का बॉन्ड पेनल्टी है।

    निजी कॉलेज के छात्र (सरकारी फीस पर): जिन छात्रों की फीस सरकार ने उठाई है, उन्हें 5 साल की सेवा देनी होगी और 25 लाख रुपये का जुर्माना प्रावधान है।

    नॉन-सर्विस पीजी छात्र (MD/MS): 1 वर्ष की सेवा और 10 लाख रुपये जुर्माना।

    इन-सर्विस उम्मीदवार, डिमॉन्स्ट्रेटर और मेडिकल ऑफिसर: इनके लिए 5 साल की अनिवार्य सेवा और 50 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान तय किया गया है।

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