राजस्थान

जयपुर नगर निगम चुनाव में बड़ा दांव, 150 वार्डों में नेताओं की साख भी दांव पर

जयपुर
 जयपुर के 150 वार्डों में फिलहाल मुकाबला पार्षद बनने का है, लेकिन दांव इससे कहीं बड़ा है। दस विधानसभा क्षेत्रों में फैली इस सियासी बिसात पर कहीं मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की साख का सवाल है, कहीं उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी की पकड़ की परीक्षा और कहीं कैबिनेट मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ की सियासी ताकत का इम्तिहान।

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हर वार्ड में समीकरण अलग हैं। कहीं 'कमल' और 'हाथ' आमने-सामने हैं तो कहीं अपनों की नाराजगी ने मुकाबले में नया कोण जोड़ दिया है। इसलिए नगर निगम का यह चुनाव सिर्फ पार्षदों की संख्या का हिसाब नहीं, राजधानी में सियासी असर की पैमाइश भी है। इस सबसे ऊपर बिना पार्षद बने किसी बाहरी को भी महापौर बनाने की 'रस्म-ए-रियायत' भी तमाम सियासी जोड़-बाकी के गणित को बिगाड़ने के लिए काफी है।

भाजपा ने प्रचार के आखिरी दिन मुख्यमंत्री को जयपुर में उतारकर अपनी प्राथमिकता साफ कर दी। इससे पहले संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष की बैठक भी पार्टी की गंभीरता का संकेत दे चुकी है। अब अपनों को साधना और वोटों को एकजुट रखना बड़ी चुनौती है।

मालवीय नगर और झोटवाड़ा में टिकट को लेकर उपजी नाराजगी ने कई वार्डों में मुकाबले के कोण बढ़ा दिए हैं। सांगानेर में सीएम की साख के साथ निर्दलीयों ने समीकरणों में तड़का लगाया है, जबकि विद्याधर नगर में कहीं दो, कहीं तीन तो कहीं चार कोण तक मुकाबले हैं। कांग्रेस भी पूरी ताकत के साथ मैदान में हैं।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली भी बुधवार को अलवर में मतदान कर राजधानी पहुंचे और उन्होंने यहां कांग्रेस प्रत्याशियों के लिए जनसंपर्क किया। कांग्रेस के विधायक और विधानसभा चुनाव के प्रत्याशी अपने-अपने इलाकों में सक्रिय हैं। उसके लिए यह चुनाव सत्ता की लड़ाई से ज्यादा राजधानी में अपनी राजनीतिक जमीन नापने का मौका है।

आदर्श नगर में पार्टी के भीतर की खींचतान, सिविल लाइंस में नए चेहरों की आजमाइश और हवामहल में पुराने चेहरों व व्यक्तिगत पकड़ का असर दिख रहा है। यहां भी बागी और निर्दलीय अधिकृत प्रत्याशियों के सामने नई चुनौती बनकर खड़े हैं। इसी बीच, एआईएमआईएम सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी की गुलाबीनगर परिक्रमा ने भी छोटे चुनाव पर बड़ा सियासी तड़का लगा दिया है।

दस विधानसभा क्षेत्रों का अपना अलग मिजाज है। कहीं संगठन की पकड़ भारी है, कहीं व्यक्तिगत रिश्ते और राजनीतिक विरासत, तो कहीं बागी उम्मीदवार पूरे गणित को नए सिरे से लिखने की कोशिश में हैं। बगरू में व्यक्तिगत पकड़ और पार्टी की साख आमने-सामने है, किशनपोल में पुराने शहर के स्थानीय और सामाजिक समीकरण अपना रंग दिखा रहे हैं, जबकि आमेर में सीधे मुकाबलों के बीच निर्दलीय तीसरा कोण बना रहे हैं।

लेकिन वार्ड की चौखट पर बड़े नेताओं के नाम से ज्यादा सड़क, सीवर, सफाई, जलभराव, पेयजल, स्ट्रीट लाइट, ट्रैफिक और अतिक्रमण जैसे सवाल असर डालेंगे। पिछली बार 250 वार्डों वाला जयपुर ग्रेटर और हैरिटेज के दो निगमों में बंटा था। अब शहर फिर एक निगम और 150 वार्डों में लौट आया है। नक्शा बदला है, मगर सियासत की गलियां वही हैं।

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