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प्रधानमंत्री मोंदी आज शहडोल में, आदिवासियों से संवाद और उनके बीच भोजन भी

खटिया पर बैठ कर देशी अंदाज में जनजातीय समुदाय से संवाद करेंगे

भोपाल,  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज मध्य प्रदेश के शहडोल में आ रहे है, इस प्रवास के दौरान प्रधानमंत्री जनजातीय समुदाय के साथ संवाद करेंगे और उन्हीं के अंदाज में जमीन मे ंबैठकर मोटे अनाज से बने व्यंजनों का स्वाद चखेंगे।
आधिकारिक तौर पर दी गई जानकारी में बताया गया है कि प्रधानमंत्री विशेष विमान से दोपहर सवा दो बजे जबलपुर पहुॅचेंगे, वहीं से हेलीकाप्टर से शहडोल के लिए प्रस्थान करेंगे। शहडोल के पकरिया गाँव की जल्दी टोला पहुॅचेंगे, जहां खटिया पर बैठ कर देशी अंदाज में जनजातीय समुदाय, फुटबॉल क्रांति के खिलाड़ियों, स्व-सहायता समूह की लखपति दीदियों और अन्य लोगों से संवाद करेंगे। ऐसा पहली बार होगा जब प्रधानमंत्री देशी अंदाज में जनजातीय समुदाय के साथ जमीन पर बैठ कर कोदो, भात- कुटकी खीर का आनंद लेंगे। संपूर्ण कार्यक्रम भारतीय परंपरा एवं संस्कृति के अनुसार होगा। प्रधानमंत्री के भोज में मोटा अनाज (मिलेट) को विशेष प्राथमिकता दी जा रही है। पकरिया गाँव की जल्दी टोला में प्रधानमंत्री के भोज की तैयारी जोर – शोर से चल रही है।
पकरिया गाँव में 4700 लोग निवास करते हैं, जिसमें 2200 लोग मतदान करते हैं। गाँव में 700 घर जनजातीय समाज के हैं, जिनमें गोंड समाज के 250, बैगा समाज के 255, कोल समाज के 200, पनिका समाज के 10 और अन्य समाज के लोग निवास करते हैं। पकरिया गाँव में तीन टोला है, जिसमें जल्दी टोला, समदा टोला एवं सरकारी टोला शामिल है।
ज्ञात हो कि पिछले दिनों 27 जून को प्रधानमंत्री मोदी का शहडोल आना प्रस्तावित था मगर भारी बारिश की चेतावनी के चलते प्रवास को स्थगित कर दिया गया था, साथ ही उसी समय तय हो गया था कि प्रधानमंत्री एक जुलाई को शहडोल आएंगे।
पकरिया गाँव का जनजातीय समुदाय अद्भुत एवं अद्वितीय इसलिए भी है कि यहाँ के जनजातियों के रीति-रिवाज, खानपान, जीवन शैली सबसे अलहदा है‌‌। जनजातीय समुदाय प्रायः प्रकृति के सान्निध्य में रहते हैं। इसलिये निसर्ग की लय, ताल और राग-विराग उनके शरीर में रक्त के साथ संचरित होते हैं।
पकरिया गाँव के जनजाति समुदाय के भोजन में कोदो, कुटकी, ज्वार, बाजरा, साँवा, मक्का, चना, पिसी, चावल आदि अनाज शामिल है। महुए का उपयोग खाद्य और मदिरा के लिये किया जाता है। आजीविका के लिये प्रमुख वनोपज के रूप में भी इसका संग्रहण सभी जनजातियाँ करती हैं। बैगा, भारिया और सहरिया जनजातियों के लोगों को वनौषधियों का परंपरागत रूप से विशेष ज्ञान है। बैगा कुछ वर्ष पूर्व तक बेवर खेती करते रहे हैं।

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