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बिलासपुर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बेटी को पैतृक संयुक्त संपत्ति से नहीं कर सकते वंचित

बिलासपुर/बेमेतरा.

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पैतृक संपत्ति में बेटी के अधिकार को लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बेटी को गहने या दूसरी चल संपत्ति दे देने से कृषि भूमि में उसका कानूनी हिस्सा समाप्त नहीं हो जाता। इसी तरह, संयुक्त संपत्ति पर लंबे समय तक खेती करने भर से कोई सह-हिस्सेदार दूसरे के अधिकार को खत्म नहीं कर सकता।

न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने भाई की दूसरी अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। इस फैसले में बहन को कृषि भूमि में आधा हिस्सा और अलग कब्जा देने का आदेश दिया गया था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पिता की मृत्यु वर्ष 1980 में होने के आधार पर बेटी को पैतृक संपत्ति के वैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

गहने देने से जमीन पर अधिकार खत्म नहीं होता
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि गहने या अन्य चल संपत्ति दिए जाने से अचल संपत्ति यानी जमीन पर किसी व्यक्ति का कानूनी अधिकार अपने आप समाप्त नहीं हो जाता। अदालत ने संयुक्त संपत्ति में प्रतिकूल कब्जे के दावे पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। हाई कोर्ट के अनुसार, संयुक्त संपत्ति पर 12 वर्ष से अधिक समय तक खेती करते रहने को ही प्रतिकूल कब्जा साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि संयुक्त संपत्ति में किसी एक सह-हिस्सेदार का कब्जा सामान्यतः सभी सह-हिस्सेदारों की ओर से माना जाता है। इसलिए केवल लंबे समय तक जमीन पर खेती करने के आधार पर दूसरे सह-हिस्सेदार के अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।

बेमेतरा जिले की 7.120 हेक्टेयर कृषि भूमि का मामला
यह विवाद छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले में स्थित 7.120 हेक्टेयर कृषि भूमि से जुड़ा है। यह जमीन याचिकाकर्ता के पिता नानकू साहू के नाम पर दर्ज थी। उनका निधन 15 सितंबर 1980 को हुआ था। पिता की मृत्यु के बाद उनके बेटे दुलार साहू ने पूरी जमीन अपने नाम पर दर्ज करा ली। इसके बाद 2007 में बेटी दुलारा बाई ने जमीन के नामांतरण को चुनौती दी। उसने संपत्ति में अपना हिस्सा मांगा और बंटवारे के लिए मुकदमा दायर किया। मामले में बहन ने कृषि भूमि पर अपने कानूनी अधिकार का दावा किया था। निचली अदालतों में सुनवाई के बाद उसे जमीन में आधा हिस्सा और अलग कब्जा देने का आदेश दिया गया, जिसे भाई ने चुनौती दी थी।

भाई ने किया गहने देने और पहले ही बंटवारा होने का दावा
भाई दुलार साहू की ओर से अदालत में दलील दी गई कि बहन को पहले ही गहने दिए जा चुके हैं। उसने यह भी दावा किया कि बहन जमीन पर अपना अधिकार छोड़ चुकी थी और परिवार में पहले ही बंटवारा हो गया था। इसी आधार पर बहन के संपत्ति संबंधी दावे का विरोध किया। हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल गहने दिए जाने या पहले बंटवारा होने का दावा करने से जमीन पर बेटी का कानूनी अधिकार समाप्त नहीं माना जा सकता। इसके लिए संबंधित दावों के समर्थन में पर्याप्त कानूनी आधार और साक्ष्य जरूरी हैं।

बेटी को जन्म से ही बेटे के समान अधिकार
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में उच्चतम न्यायालय के विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा मामले में दिए गए निर्णय का भी हवाला दिया। अदालत ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की संशोधित धारा 6 का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि बेटी को पैतृक संपत्ति में बेटे के समान अधिकार जन्म से ही प्राप्त हैं। अदालत ने कहा कि इन अधिकारों के लिए यह जरूरी नहीं है कि 9 सितंबर 2005 को पिता जीवित हों। इस कानूनी व्यवस्था के आधार पर केवल पिता की वर्ष 1980 में हुई मृत्यु का हवाला देकर बेटी को पैतृक संपत्ति में उसके वैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट ने भाई की दूसरी अपील की खारिज
सभी दलीलों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने भाई की दूसरी अपील खारिज कर दी। अदालत ने सत्र न्यायालय के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें बहन को कृषि भूमि में आधा हिस्सा और अलग कब्जा देने का आदेश दिया गया था।

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