हमर छत्तीसगढ़

इंदिरा-नरसिम्हा राव के कद्दावर मंत्री अब RSS मंच पर! कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी क्यों हैं ये दोस्ती

रायपुर
 छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ आदिवासी नेता अरविंद नेताम को आरएसएस के नागपुर मुख्यालय में चीफ गेस्ट के तौर पर बुलाया गया है। इंदिरा गांधी सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके और बस्तर क्षेत्र से आने वाले नेताम आज 5 जून को संघ के 'कार्यकर्ता विकास वर्ग-द्वितीय समापन समारोह' में मुख्य अतिथि होंगे। यह स्वयंसेवकों या संघ कैडर के लिए तीन साल के प्रशिक्षण अवधि का समापन है। छत्तीसगढ़ की राजनीति में आदिवासी वोटों के महत्व को देखते हुए प्रदेश की राजनीति गरमाई हुई है।

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2018 में प्रणव मुखर्जी भी हो चुके शामिल

यह वही कार्यक्रम है, जिसमें पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी 2018 में शामिल हुए थे, जिसकी कांग्रेस के कुछ वर्गों ने आलोचना की थी। राजनीतिक उद्देश्यों के बारे में सवालों के बीच, 83 वर्षीय आदिवासी नेता ने कहा कि वह संघ के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने और बस्तर में आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने के लिए भाग लेने की योजना बना रहे हैं। फिलहाल आरएसएस के निमंत्रण पर राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई है।

आमंत्रण मिलने पर क्या बोले नेताम?

अरविंद नेताम कहते हैं कि मैं आरएसएस कार्यक्रम में इसलिए जा रहा हूं क्योंकि मैं आदिवासी मुद्दों को समझाने के लिए आरएसएस के साथ मजबूत संचार चाहता हूं। बस्तर में अभी सबसे बड़ा मुद्दा धर्मांतरण है। मेरा मानना है कि अगर आरएसएस हमारा समर्थन करता है, तो भाजपा सरकार हमारी मांगों पर ध्यान देगी। हमने ही पिछले साल दिसंबर में अपने आदिवासी कार्यक्रम में आरएसएस नेताओं को आमंत्रित किया था। साथ ही, महीनों पहले, मैं रायपुर में मोहन भागवत से मिला और आदिवासी मुद्दों पर चर्चा की थी।

आदिवासी समाज के लिए उठाई थी मांग

नेताम ने जनगणना में आदिवासियों के लिए एक अलग कोड की आवश्यकता पर भी बात करने की बात कही। उन्होंने कहा 'हमारी अपनी संस्कृति और धार्मिक प्रथाएं हैं। हम किसी भी धर्म के तहत परिभाषित नहीं होना चाहते हैं; हमें अपना कोड चाहिए। बातचीत के कारण धीरे-धीरे बदलाव हो रहे हैं। वे (आरएसएस) धीरे-धीरे हमें आदिवासी कह रहे हैं, वनवासी नहीं।'

अरविंद नेताम की आदिवासी इलाकों में अभी भी पैठ

बस्तर में एक प्रभावशाली आदिवासी नेता के रूप में नेताम अभी भी राजनीतिक रूप से मजबूत पकड़ रखते हैं। 2023 में विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले, उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थी। इससे पहले उन्होंने सर्व आदिवासी समाज (एसएएस) से अलग होकर अपनी राजनीतिक पार्टी हमर राज बनाई थी। उस समय, नेताम ने कहा था कि हमर राज का गठन संघ के समान है, जिसके तहत 'बीजेपी सहित 50 से अधिक स्वतंत्र समूह हैं।'

संघ की नेताम से करीबी से कांग्रेस को क्या हैं नुकसान

चुनावों में, हमर राज ने कम से कम दो विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया और लोकसभा चुनावों में कांकेर संसदीय सीट पर भी कांग्रेस की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाया। कांग्रेस पहले से ही आदिवासी वोटों को वापस पाने के लिए संघर्ष कर रही है, ऐसे में नेताम का संघ की ओर झुकाव कांग्रेस के लिए चिंता का विषय हो सकता है।

2018 के बाद से कांग्रेस को नुकसान

2018 में जब कांग्रेस सत्ता में आई थी, तो उसने अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में 29 में से 25 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा को तीन सीटें मिली थीं। हालांकि, आदिवासी मुद्दों को प्रभावी ढंग से संबोधित करने में विफलता के कारण आदिवासियों के बीच कांग्रेस की पकड़ कमजोर हो गई और 2023 में कांग्रेस की एसटी सीटों की संख्या घटकर 11 हो गई, जबकि भाजपा ने 17 सीटें जीतीं।

'बीजेपी में चले भी जाएं तो कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं'

कांग्रेस का तर्क है कि अगर नेताम भाजपा में जाते भी हैं, तो भी इसका उसकी राजनीतिक संभावनाओं पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। कांग्रेस के प्रदेश संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने कहा, 'उन्होंने (नेताम) एक अलग राजनीतिक रास्ता अपनाया और पार्टी छोड़ दी। वह एक बड़े आदिवासी नेता हैं, लेकिन हम आदिवासियों के बारे में आरएसएस के विचार जानते हैं। आरएसएस आदिवासियों को वनवासी कहता है, आदिवासी नहीं। तो, क्या नेताम इससे सहमत हैं? राजनीतिक रूप से, इससे चुनावों में कोई फर्क नहीं पड़ेगा… बस्तर की जनता उनका समर्थन नहीं करती है।'

आलोचकों को भी आमंत्रित करता है संघ

बस्तर में काम करने वाले आरएसएस के पदाधिकारी मानते हैं कि नेताम आदिवासियों के लिए 'अच्छा काम' कर रहे हैं। वह धर्मांतरण का विरोध करते हैं। आरएसएस के एक पदाधिकारी ने कहा कि 'हम उन लोगों को भी आमंत्रित करते हैं जो हमारे आलोचक हैं। हजारों लोग कार्यक्रम में भाग लेंगे। कई लोग जो संघ को समझना चाहते हैं, वे भी वहां होंगे।'

बीजेपी का इस मामले पर क्या है रुख?

हालांकि बीजेपी का इस मामले पर अलग रूख है। बीजेपी के एक नेता कहते हैं कि आरएसएस के निमंत्रण को राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आरएसएस में कोई राजनीतिक भेदभाव नहीं है। इससे पहले, प्रणब मुखर्जी को आमंत्रित किया गया था और उन्होंने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। यह एक राष्ट्रवादी संगठन है जो समाज के हर वर्ग के साथ मिलकर काम करने में विश्वास करता है।'

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